◼️ काव्यरंग :- जिंदगी

जिंदगी 

जिंदगी एक किरायेका घर है
सब बेचा तुन्हे परायेका द्वार है.

तुही बता यारो मालिक या नौकर
गार्वो का खाना खिलाये फकीर है.

यह उम्र मे अच्छे दान किये नही
लालच मे आके कैसाये अमीर है.

बुरा मानो या सच कडवा होता
उपर बुलावा आयेगा जाना दुर है.

आदत सिली ऑखे गिली कर दी
याद कोनेमें छायी दिखाये तस्वीर है.

हरे पत्ते पिले होना शुरू हुई तबसे
काले सफेद रंग झलकाये और है.

मेरा मेरा करके अब क्या फायदा
किस्मत रोना हसना मजबूर है.

◼️✍️ प.सु.किन्हेकर, वर्धा
©सदस्य मराठीचे शिलेदार समूह

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