◼️ काव्यरंग :- नई सुबह के इंतजार में

नई सुबह के इंतजार में

वक़्त गुजरता गया, दिन ब दिन ढलते ढलते।
कोसिशे फिर भी जारी है, नई सुबह के इंतजार में।।
कल कैसा था और अब आज कैसा है।
एक दूसरे से दूर दूर अपने अपने दरवाजों में।।
हर कोई अब आस लगाए बैठा है।
नई सुबह के इंतज़ार में।।
ना रिश्ते नातों का मोल रहा अब।
लगे है खुद को बचाने में।।
माना कुछ हद तक ये है सही,
मगर कब तक रहोगे ऐसे तहखाने में।।
कभी रौशन थे घर, गांव- मोहल्ले,
सारी खुशियां सिमट कर रह गई।
गुलज़ार हो रही जिंदगियों में खामोशी सी छा गई।।
देख रहे एकदुसरे को दूर दूर से,
जो बैठे रहते थे कभी महफ़िल में।
गलियां, चौराहे सुने पड़ गए,
हो गए बन्द सभी पिंजरों में।।
आखिर कब तक चलेगा ये सिलसिला,
आ रही है कमजोरी हौसलों में।
आस लगाए बैठी है दुनियां, नई सुबह के इंतज़ार में।।

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